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शरीर बिकना ही बेचने की क्रिया नहीं होती.. अम्मा तों अन्य परिपेक्ष में इसे दुहराती थी.मासूमियत, विचार, ईमानदारी, समझ, कल्पनाओ का बिकना शरीर से ज्यादा महंगा हैं..
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आनन्द फिल्म के आखरी में अमीताभ जी एक कविता पढ़ते हैं। मौत तू एक कविता है मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको डूबती नब्ज़ों में जब दर्द को नींद आने लगे ज़र्द सा चेहरा लिये जब चांद उफक तक पहुँचे दिन अभी पानी में हो, रात किनारे के करीब ना अंधेरा ना उजाला हो, ना अभी रात ना दिन जिस्म जब ख़त्म हो और रूह को जब साँस आऐ मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको



हां जो में जोडुंगी वे बाते आक्समिक ही मेरें दिमाग में तहरों की तरह उठती हैं। कभी मेट्रों में बैठें तो कभी कक्षा की किसी चर्चा के दौरान. मैं बातूनी थोड़ी कम हूं बोलती कम हूं लेकिन लिखनें में आलसी नहीं।


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