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हां जो में जोडुंगी वे बाते आक्समिक ही मेरें दिमाग में तहरों की तरह उठती हैं। कभी मेट्रों में बैठें तो कभी कक्षा की किसी चर्चा के दौरान. मैं बातूनी थोड़ी कम हूं बोलती कम हूं लेकिन लिखनें में आलसी नहीं।
शरीर बिकना ही बेचने की क्रिया नहीं होती.. अम्मा तों अन्य परिपेक्ष में इसे दुहराती थी.मासूमियत, विचार, ईमानदारी, समझ, कल्पनाओ का बिकना शरीर से ज्यादा महंगा हैं..
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